डॉ. अंबेडकर ने क्यों किया था समान नागरिक संहिता का समर्थन? जानिए संविधान सभा में किसने किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान, केएम मुंशी, अल्लादी कृष्णावामी और अंबेडकर ने यूसीसी का बचाव किया था।

भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश में समान नागरिक संहिता (UCC) की वकालत करने के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा तेज है। भोपाल में पीएम मोदी ने UCC का जिक्र करते हुए कहा था, ‘एक ही परिवार में दो लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते। ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा

भाजपा और UCC की मांग

भारतीय जनसंघ (अब भाजपा) ने साल 1967 के आम चुनाव में ‘समान नागरिक संहिता’ को अपने मेनिफेस्टो में पहली बार शामिल किया था। भारतीय जनसंघ का वादा था कि अगर वह सरकार बनाती है तो देश में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू करेगी। हालांकि जनसंघ को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला और अगरे कुछ वर्षों के लिए यूसीसी ठंडे बस्ते में चला गया।

भोपाल में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री मोदी द्वारा देश में समान नागरिक संहिता (UCC) की वकालत करने के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड पर चर्चा तेज है। भोपाल में पीएम मोदी ने UCC का जिक्र करते हुए कहा था, ‘एक ही परिवार में दो लोगों के लिए अलग-अलग नियम नहीं हो सकते। ऐसी दोहरी व्यवस्था से घर कैसे चल पाएगा?’

भाजपा और UCC की मांग

भारतीय जनसंघ (अब भाजपा) ने साल 1967 के आम चुनाव में ‘समान नागरिक संहिता’ को अपने मेनिफेस्टो में पहली बार शामिल किया था। भारतीय जनसंघ का वादा था कि अगर वह सरकार बनाती है तो देश में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ लागू करेगी। हालांकि जनसंघ को सरकार बनाने का मौका नहीं मिला और अगरे कुछ वर्षों के लिए यूसीसी ठंडे बस्ते में चला गया।

साल 1980 में जनसंघ जब भाजपा बनी तब एक बार ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ की मांग नए सिरे से शुरू हुई। भाजपा के जन्म से ही उसके यूसीसी समेत तीन प्रमुख एजेंडे थे, जिसमें से दो (राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 का खात्मा) को पूरा किया जा चुका है।

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार “राज्य अपने नागरिकों के लिए पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) प्रदान करने का प्रयास करेगा।” समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित व्यक्तिगत कानूनों को देश के प्रत्येक नागरिक को नियंत्रित करने वाले सामान्य नियमों से प्रतिस्थापित करना है। हालांकि एक बड़ा सवाल यह है कि संविधान में शामिल होने के बावजूद इसे अभी तक लागू क्यों नहीं किया गया है? संविधान निर्माताओं ने इसके बारे में क्या महसूस किया?

संविधान सभा और UCC की बहस

समान नागरिक संहिता कोई नया विषय नहीं है। इस विषय पर संविधान निर्माताओं ने भी विचार-विमर्श किया था। भारत के पहले कानून मंत्री डॉ भीम राव अम्बेडकर, जिन्हें ‘संविधान का जनक’ भी कहा जाता है, वह संविधान सभा की बहसों के दौरान समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे।

साल 1980 में जनसंघ जब भाजपा बनी तब एक बार ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ की मांग नए सिरे से शुरू हुई। भाजपा के जन्म से ही उसके यूसीसी समेत तीन प्रमुख एजेंडे थे, जिसमें से दो (राम मंदिर निर्माण और अनुच्छेद 370 का खात्मा) को पूरा किया जा चुका है।

 

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 के अनुसार “राज्य अपने नागरिकों के लिए पूरे भारत में एक समान नागरिक संहिता (यूसीसी) प्रदान करने का प्रयास करेगा।” समान नागरिक संहिता का उद्देश्य विभिन्न धार्मिक समुदायों के धर्मग्रंथों और रीति-रिवाजों पर आधारित व्यक्तिगत कानूनों को देश के प्रत्येक नागरिक को नियंत्रित करने वाले सामान्य नियमों से प्रतिस्थापित करना है। हालांकि एक बड़ा सवाल यह है कि संविधान में शामिल होने के बावजूद इसे अभी तक लागू क्यों नहीं किया गया है? संविधान निर्माताओं ने इसके बारे में क्या महसूस किया?

संविधान सभा और UCC की बहस

समान नागरिक संहिता कोई नया विषय नहीं है। इस विषय पर संविधान निर्माताओं ने भी विचार-विमर्श किया था। भारत के पहले कानून मंत्री डॉ भीम राव अम्बेडकर, जिन्हें ‘संविधान का जनक’ भी कहा जाता है, वह संविधान सभा की बहसों के दौरान समान नागरिक संहिता के पक्ष में थे।

अम्बेडकर कई राजनीतिक दिग्गजों के साथ समान नागरिक संहिता के प्रस्तावक थे। नजीरुद्दीन अहमद सहित कई सदस्य इसके खिलाफ थे। खिलाफ में तर्क पेश कर रहे सदस्यों का कहना था कि अलग-अलग समुदायों के धार्मिक कानूनों को प्रभावित नहीं किया जाना चाहिए। यूसीसी के खिलाफ प्रतिरोध रूढ़िवादी हिंदुओं की ओर से भी हुआ, जिन्होंने महसूस किया कि यूसीसी उनके व्यक्तिगत कानूनों को प्रभावित करेगा, जो उनके शास्त्रों द्वारा निर्धारित होते हैं। अंबेडकर का विचार था कि धार्मिक सहिंता पूरी तरह से भेदभावपूर्ण प्रकृति के हैं जहां महिलाओं को बहुत कम या कोई अधिकार नहीं दिया गया था।

संविधान सभा की बहस के दौरान, केएम मुंशी, अल्लादी कृष्णावामी और अंबेडकर ने यूसीसी का बचाव किया, जबकि मुस्लिम नेताओं ने तर्क दिया कि यह वैमनस्य को बढ़ावा देगा। हालांकि, अल्लादी का विचार था कि इससे लोगों के बीच मित्रता पैदा होगी और एकता की भावना बढ़ेगी।

अंबेडकर और UCC

संविधान सभा की बहस के दौरान अल्लादी के विचारों का समर्थन करते हुए अम्बेडकर ने कहा कि, “समान नागरिक संहिता में कुछ भी नया नहीं है। विवाह, उत्तराधिकार के क्षेत्रों को छोड़कर देश में पहले से ही एक कॉमन सिविल कोड मौजूद है- जो संविधान के मसौदे में समान नागरिक संहिता का मुख्य भी लक्ष्य हैं।” हालांकि, अम्बेडकर का यह भी मानना ​​था कि यूसीसी वैकल्पिक होना चाहिए।

अम्बेडकर ने तर्क दिया था कि यूसीसी की अनुपस्थिति सामाजिक सुधारों में सरकार के प्रयासों में बाधा उत्पन्न करेगी। CONSTITUENT ASSEMBLY DEBATES के खंड सात में अंबेडकर के तर्क को पढ़ा जा सकता है। उन्होंने साफ कहा था, “मुझे व्यक्तिगत रूप से समझ में नहीं आता कि धर्म को इतना विशाल, विस्तृत क्षेत्राधिकार क्यों दिया जाना चाहिए ताकि पूरे जीवन को ही प्रभावित करे और विधायिका को उस क्षेत्र में काम करने से रोके। आख़िर हमें यह आज़ादी किसलिए मिल रही है? हमें यह स्वतंत्रता अपनी सामाजिक व्यवस्था को सुधारने के लिए मिल रही है, जो असमानताओं, भेदभावों और अन्य चीजों से इतनी भरी हुई है, जो हमारे मौलिक अधिकारों के साथ टकराव करती है। इसलिए किसी के लिए भी यह कल्पना करना बिल्कुल असंभव है कि पर्सनल लॉ को राज्य के अधिकार क्षेत्र से बाहर रखा जाएगा।

हिंदू कोड बिल और यूसीसी

यूसीसी के बारे में अम्बेडकर के दृष्टिकोण को उनकी हिंदू कोड बिल की मांग में भी देखा जा सकता है। हिंदू कोड बिल का उद्देश्य हिंदू पर्सनल लॉ के स्थान पर एक नागरिक संहिता प्रदान करना था, जिसे ब्रिटिश अधिकारियों द्वारा केवल एक सीमित सीमा तक संशोधित किया गया था। कई नेताओं, जिनमें अधिकतर उच्च वर्ग के हिंदू थे, उन्होंने विधेयक का पुरजोर विरोध किया। संसद ने विवाह, उत्तराधिकार आदि में समानता की मांग करने वाले विधेयक के मसौदे को रोक दिया, जिसके परिणामस्वरूप अम्बेडकर ने 1951 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। संक्षेप में कहें तो अम्बेडकर हमेशा यूसीसी के समर्थक थे। सभा में भारी विरोध के बावजूद अम्बेडकर अपने विचारों पर काफी दृढ़ थे।

अंबेडकर ने भविष्य के लिए छोड़ा था UCC

संविधान सभा में यूसीसी की बहस पर विराम लगाते हुए अंबेडकर ने कहा था, “यूनिफॉर्म सिविल कोड वैकल्पिक व्यवस्था है। ये अपने चरित्र के आधार पर नीति निदेशक सिद्धांत होगा और इसी वजह से राज्य तत्काल यह प्रावधान लागू करने के लिए बाध्य नहीं है। राज्य जब उचित समझें तब इसे लागू कर सकता है। शुरुआती संशोधनों का जवाब देते हुए आंबेडकर ने कहा कि भविष्य में समुदायों की सहमति के आधार पर ही इस प्रावधान पर कानून बनाए जा सकते हैं और यूनिफॉर्म सिविल कोड को लागू किया जा सकता है।

 

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