गोरों का गुमान: आतंकवादी निज्जर पर पश्चिम की नैतिकता की दुहाई हमें क्या बताती है

श्रीमोय तालुकदार

नई दिल्ली. 31 जुलाई, 2022 को, काबुल में अपने पोते-पोतियों के साथ रहने वाले एक सेवानिवृत्त चिकित्सक अपने घर की बालकनी पर बैठे, सुबह की धूप का आनंद ले रहे थे. जैसा कि सीआईए ने बाद में खुलासा किया कि अल कायदा के नेता अयमान अल-जवाहिरी को सुबह अकेले पढ़ना पसंद था. आगे क्या हुआ, यह जानने के लिए आइए पेंटागन द्वारा दो दिन बाद जारी एक प्रेस वक्तव्य पढ़ लेते हैं.

“जवाहिरी काबुल शहर में एक ओवर-दि-होराइजन ऑपरेशन में मारा गया, जहां वह तालिबान के मेहमान के रूप में रह रहा था. रविवार को काबुल के समयानुसार सुबह 6:18 बजे एक सटीक, आतंकवाद विरोधी अभियान में घर पर दो हेलफायर मिसाइलों से हमला किया गया. इसमें अकेले जवाहिरी की मौत हुई… उसकी मौत अल-कायदा (जैसा विज्ञप्ति में लिखा था) के लिए एक बड़ा झटका है और इससे समूह की अमेरिकी मातृभूमि सहित दूसरी अन्य जगह संचालन करने की क्षमता कम हो जाएगी.’

न्यूयॉर्क टाइम्स ने जवाहिरी को “दुनिया के सर्वाधिक वांछित आतंकवादियों में से एक” कहा, जबकि अल जजीरा ने उसे “मिस्र का सर्जन” बताया. हो सकता है यह नजरिये का मामला हो. 

पश्चिम का नैतिकता का पाखंड
कितनी दिलचस्प बात है कि, उसी दिन, 2 अगस्त को, कनाडाई प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने जवाहिरी पर सीआईए ड्रोन हमले की सराहना करते हुए, विदेशी धरती पर मिस्र के एक नागरिक की गैर-न्यायिक, गैरकानूनी हत्या को अंजाम देने के लिए अमेरिका को बधाई दी. किसी भी तरह के नैतिक मलाल से दूर, जैसा की ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकवादी की हत्या पर दिखाया, एक ट्वीट में दावा किया, “अयमान अल-जवाहिरी की मौत सुरक्षित दुनिया की ओर एक कदम है.”

एक कहावत है, ‘पाखंड वह दाम है जो पाप, पुण्य को चुकाता है.’ भारत और कनाडा के बीच बढ़ते राजनयिक संकट से उस जबरदस्त दोगलेपन का पता चलता है जो पश्चिम के ‘नियम-आधारित आदेश’ के मूल में निहित है जो इस अटूट सिद्धांत पर चलता है कि ‘श्वेत हमेशा सही होता है.’ जब पश्चिम की बात आती है, तो उनके दुश्मन “आतंकवादी” हो जाते हैं, जिनके पास कोई मानवाधिकार नहीं होता है, न ही जिन देशों में उन्हें आश्रय मिलता है, उनके पास संप्रभुता का कोई दावा होता है. सीरिया में आईएसआईएस नेता अबू बक्र अल-बगदादी को मारने के बाद, डोनाल्ड ट्रंप शेखी मारते हुए कहते हैं, “वह एक कुत्ते की मौत मारा गया… भगवान अमेरिका का हमेशा भला करे.” इसके बाद पश्चिम ने करतल ध्वनि में ताली बजाई.

लेकिन ये तालियां तभी बजती हैं जब दूसरी तरफ खड़ा देश ग्लोबल साउथ का सदस्य है. जहां पश्चिम की चिंताएं, “वाकई में चिंताएं” मानी जाती हैं और जिन आतंकियों को वो दुनिया के किसी भी कोने से ढूंढ निकालकर खत्म कर देते हैं जिसे पश्चिम की मीडिया तुरंत जायज बताने में सक्रियता दिखाती है. वहीं, भारत जैसे देश की वाजिब चिंताओं के लिए भी पश्चिम के तय नियमों पर खरा उतरने की अनकही शर्त है, वो शर्त जो कभी पूरी होती नहीं दिखती.

पश्चिम जिसे वक्त पड़ने पर आतंकी भी पितातुल्य लगता है
अचानक, जो आतंकवादी लक्षित हत्याएं करते हैं, आतंक और नशीले पदार्थों के नेटवर्क को वित्त पोषित करते हैं और अलगाववादी गतिविधियों को अंजाम देते हैं, वे केवल “सामुदायिक कार्यकर्ता”, “प्लंबर”, “मंदिर नेता”, “पितातुल्य व्यक्ति” ईमानदार जीवन जी रहे हैं और राज्य दमन के शिकार बताए जाने लगते हैं. जैसा सीमा सिरोही ने एक्स पर लिखा,’ यह पश्चिमी लक्षणों के साथ नियम-आधारित आदेश हैं.’ नियम-आधारित आदेश वैश्विक शासन की एक प्रणाली पर आधारित है जो द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विकसित हुई है. इस नियम-आधारित व्यवस्था के केंद्र में संयुक्त राष्ट्र को माना जाता है.

वहीं ट्रूडो जिन्होंने जवाहिरी को उखाड़ फेंकने का जश्न मनाया था, घरेलू राजनीतिक मजबूरियों के चलते खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर को गोद में बैठाए हुए हैं. भले ही नई दिल्ली ने ओटावा के साथ एक फाइल साझा की थी, जिसमें निज्जर के खिलाफ दर्ज एक दर्जन से अधिक आपराधिक मामलों का प्रासंगिक विवरण और दो दशकों में भारत के खिलाफ उसके द्वारा की गई अन्य आतंकवादी गतिविधियों पर खुफिया जानकारी शामिल थी. ट्रूडो शासन सबूतों को नजरअंदाज करता रहा, और प्रत्यर्पण के आग्रह पर ठंडा रवैया बनाए रखा. कुल मिलाकर भारत को हिंसक रूप से विभाजित करने के उद्देश्य से खालिस्तानी आंदोलन के पुनरुद्धार के लिए निज्जर को, कनाडा को मंच बनाने की खुली छूट दे दी.

निज्जर आतंकी है, था और रहेगा
जाहिर है, चूंकि खालिस्तानियों को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा था, यहां तक ​​कि कनाडाई राजनीतिक प्रतिष्ठान से प्रोत्साहन भी हासिल हो रहा था. निज्जर की खालिस्तानी पृष्ठभूमि अच्छी तरह से स्थापित थी. नई दिल्ली ने ओटावा के साथ जो दस्तावेज साझा किए थे, जो अब सार्वजनिक डोमेन पर भी हैं, एक अनाकर्षक तस्वीर पेश करते हैं. इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कनाडाई लोगों की बातों को दुनिया किस तरह से लेती है. निज्जर एक आतंकवादी, जबरन वसूली करने वाला, रैकेटियर और हत्यारा था. वह मिशन हिल्स, ब्रिटिश कोलंबिया में आतंकवादी शिविर चलाता था, जहां उसने खालिस्तानी चरमपंथियों को एके-47, स्नाइपर राइफल और पिस्तौल का उपयोग करने का प्रशिक्षण दिया था और 2020 में भारत के गृह मंत्रालय द्वारा गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम  (यूएपीए) के तहत उसे ‘व्यक्तिगत आतंकवादी’ के रूप में नामित किया गया था. भारतीय खुफिया विभाग द्वारा तैयार किए गए दस्तावेज के हवाले से भारतीय मीडिया में आई खबरों के मुताबिक, निज्जर को पाकिस्तान स्थित केटीएफ (खालिस्तानी टाइगर फोर्स) के प्रमुख जगतार सिंह तारा ने कट्टरपंथी बनाया और आईएसआई  ने उसे तैयार किया. उसकी गतिविधियों की एक लंबी फेररिस्त है, जिसमें राजनीतिक नेताओं और पुलिस की लक्षित हत्याओं, फिरौती और अपहरण शामिल है. जिसे केटीएफ म़ॉड्यूल के जरिए अंजाम तक पहुंचाया जाता था, जिसके सदस्यों को  प्रिशिक्षित, वित्त पोषित और संचालित करने का काम भी निज्जर ही करता था. पूर्व भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या की ‘खालिस्तानी विरासत’ के बारे में शेखी बघारते निज्जर के वीडियो सोशल मीडिया पर प्रचुर मात्रा में हैं.

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