क्या है पाकिस्तान का राष्ट्रीय वृक्ष, जिसे भारत में बहुत पवित्र माना जाता है

पाकिस्तान ने आजादी के बाद राष्ट्रीय पशु, राष्ट्रीय पक्षी से लेकर कई नेशनल सिंबल घोषित किए. ये राष्ट्रीय प्रतीक ऐसे हैं, जिनमें से कई में उसके तार भारत से जुड़े हुए हैं. इसकी वजह ये भी है कि अलग होने के बाद भी सांस्कृतिक और भौगोलिक तौर पर दोनों देश एक ही थे. अब असली वजह पर आते हैं. क्या आपको मालूम है कि पाकिस्तान का राष्ट्रीय वृक्ष कौन सा है.

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पाकिस्तान का राष्ट्रीय वृक्ष वो पेड़ है, जिसे हमारे देश में भगवान शिव का सबसे प्रिय पेड माना जाता रहा है. आज भी उसे हिंदू धर्म में पवित्रता, शांति और आध्यात्म से जोड़कर देखा जाता है. भारत में माना जाता रहा है कि ये पेड़ जहां होता है, वहां उसमें भगवान शिव का वास होता है. जब आप इन वृक्षों के करीब जाते हैं तो वास्तव में एक असीम शांति का अनुभव करते हैं. (wiki commons)

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ये वृक्ष देवदार के हैं, जो पाकिस्तान में आजादी के बाद वहां राष्ट्रीय वृक्ष घोषित किया गया. उसकी वजह शायद ये थी कि ये हिमालय के उन क्षेत्रों में भी पाया जाता था, जो पाकिस्तान के अंतर्गत आते थे. ये वृक्ष अपनी ऊंचाई, अनूठेपन, मजबूती और पर्यावरण के लिहाज से खास तो थे ही बल्कि खासे दर्शनीय भी होते हैं. पाकिस्तान में इन वृक्षों की तादाद अच्छी खासी है.  (wiki commons)

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देवदार शाश्वत का प्रतीक है. यह राजसी, लंबा, सुंदर और निडर है. यह पहाड़ों के प्रचंड तूफानों या कंपकंपा देने वाली बर्फबारी का सामना करते हुए सीधा खड़ा होकर रक्षा करता है. बर्फ से ढका हुआ, यह एक साधु की तरह दिखता है, जो अपने शुद्ध सफेद वस्त्रों में प्रार्थना में हाथ फैलाए खड़ा है.  (wiki commons)

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वहीं भारत में भी कश्मीर से लेकर उत्तराखंड तक देवदार के पेड़ों के खूब जंगल मिल जाएंगे. उत्तराखंड के पहाड़ी राज्यों में तो इस पेड़ की काफी महत्वपूर्ण भूमिका है. देवदार हिमालय में काफी संख्या में पाया जाता है. आमतौर पर ये पेड़ 1900 से लेकर 2700 मीटर तक की ऊंचाई पर होता है. घर बनाने से लेकर फर्नीचर बनाने और अरोमा थैरेपी में देवदार का तेल काफी असरकारक माना जाता है. इन वृक्षों की लकड़ियों और पत्तियों में हल्की सुगंध भी मिलती है.

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देवदार को अंग्रेजी में सिडरस कहते हैं. उनकी लंबाई 40 से 50 मीटर तक होती है. इसे लार्ज एवरग्रीन कोनिफर ट्री (Large Evergreen Conifer Tree) भी कहा जाता है. इसकी पत्तियां सुई की तरह नुकीली होती हैं. इसके तने, पत्तियों और बाकी लकड़ी में तमाम तरह के केमिकल पाए जाते हैं, जिनमें टैक्सीफोलिन (Taxifolin), सिडरिन (Cidrin), डिओडेरिन (Deoderin), टैक्सीफिनौल (Taxiphenol), लेलोनॉल (Lelonol), एंथोल (Enthol) शामिल हैं.  (wiki commons)

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देवदार को संस्कृत भाषा में देवदारु कहते हैं, जिसका मतलब है वुड ऑफ द गॉड यानी भगवान की लकड़ी. कहा जाता है कि पुराने समय में ऋषि-मुनि भगवान शिव की आराधना करने के लिए इसी पेड़ के नीचे तप करते थे. इस पेड़ में भोलेनाथ का वास माना जाता है, जिस वजह से इसे घर के आसपास लगाने से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा मिलती है.

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ये पेड़ एक हजार साल तक जीवित रह सकते हैं. उन्हें समृद्धि का प्रतीक माना जाता है. इसे ‘भगवान के पेड़’ के रूप में पूजा जाता है. पश्चिमी हिमालय में, देवदार को शिव पूजा के साथ निकटता से जोड़ा जाता है. अक्सर देवदार के समूह के पास एक शिव मंदिर पाया जाता है. देवदार की लकड़ी अत्यंत टिकाऊ और सड़न प्रतिरोधी होती है. इसकी लकड़ी में कीड़े भी नहीं लगते हैं.

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कश्मीर और पाकिस्तान के कई इलाकों में देवदार की लकड़ियों का इस्तेमाल प्रचुरता के साथ घर बनाने में किया जाता रहा है. इससे मस्जिदों में भी इस्तेमाल किया जाता रहा था. 1926 के साइंटिफिक अमेरिकन लेख में कश्मीर में देवदार की लकड़ी से बने एक पुल का वर्णन किया गया था जो चार शताब्दियों तक नदी के पानी के संपर्क में रहने के बाद थोड़ा खराब हो गया था.  (wiki commons)

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देवदार की लकड़ी अपने उपचारात्मक गुणों के लिए भी बेशकीमती है. भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा के अनुसार, देवदार की छाल, तेल और लकड़ी के पाउडर में सूजन-रोधी, एंटी-ऑक्सीडेंट और कैंसर-विरोधी गुण होते हैं. ये बुखार, दस्त और पेचिश के खिलाफ, एक्जिमा और सोरायसिस जैसे त्वचा रोगों के लिए और पाचन में सहायता के लिए उपयोग में लाया जाता है.  (wiki commons)

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